मीना कुमारी की 5 जबरदस्त ग़ज़ल जो आप सुनकर हैरान हो जाओगे

मीना कुमारी की 5 जबरदस्त ग़ज़ल जो आप सुनकर हैरान हो जाओगे

  1. चांद तनहा है आसमां तन्हा
  2. टुकड़े-टुकड़े दिन बीता
  3. शीशे का बदन
  4. आगाज तो होता है
  5. महंगी रात

आबला-पा कोई इस दश्त में आया होगा – Meena Kumari New Gazal


चांद तन्हा है आसमां तन्हा

चांद तनहा है आसमां तन्हा
दिल मिला है कहां-कहां तनहा

बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआं तन्हा
जिंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा

हमसफर कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहां तन्हा

जलती-बुझती-सी रौशनी के परे
सिमटा-सिमटा सा इक मकां तन्हा

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे यह जहां तन्हा…

चांद तनहा है आसमां तन्हा….


टुकड़े-टुकड़े दिन बीता

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आंचल था, उतनी ही सौगात मिली

रिमझिम-रिमझिम बूंदों में, जहर भी है और अमृत भी
आंखें हंस दी दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हंसने की आवाज सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली
मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली

होंठों तक आते-आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आंखों में, सादा-सी जो बात मिली।

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता….


शीशे का बदन

कितना हल्का-सा, हल्का-सा तन हो गया
जैसे शीशे का बदन हो गया
गुलमोहर के-से फूलों में बिखरी हुई
कहकशां के-से रस्ते पे निखरी हुई
मेरी पलकों पे मोती झालर सजी
मेरे बालों ने अफशां की चादर बुनी

मेरे आंचल ने आंखों पे घूंघट किया
मेरी पायल ने सबसे पलट कर कहा
अब कोई भी न कांटा चुभेगा मुझे
जिंदगानी भी देगी न ताना मुझे

शाम समझाए भी तो न समझूंगी मैं
रात बहलाए भी तो न बहलूंगी मैं

सांस उलझाए भी तो न उलझूंगी मैं
मौत बहकाए भी तो न बहकूंगी मैं
मेरी रूह भी जला-ए-वतन हो गई
जिस्म सारा मेरा इक सेहन हो गया

कितना हल्का-सा, हल्का-सा तन हो गया
जैसे शीशे का सारा बदन हो गया।

शीशे का बदन…


आगाज तो होता है

आगाज तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वह नाम नहीं होता

जब जुल्फ की कालिख में गुम जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता

हंस-हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े
हर शख्स की किस्मत में ईनाम नहीं होता
बहते हुए आंसू ने आंखों से कहा थमकर
जो मय से पिघल जाए वह जाम नहीं होता

दिन डूबे हैं या डूबी बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता।

आगाज तो होता है…


महंगी रात

जलती-बुझती-सी रोशनी के परे
हमने एक रात ऐसे पाई थी
रूह को दांत से जिसने काटा था
जिस्म से प्यार करने आई थी

जिसकी भींची हुई हथेली से
सारे आतिश फशां उबल उट्ठे

जिसके होंठों की सुर्खी छूते ही
आग-सी तमाम जंगलों में लगी
आग माथे पे चुटकी भरके रखी
खून की ज्यों बिंदिया लगाई हो

किस कदर जवान थी,
कीमती थी
महंगी रात
हमने जो रात यूं ही पाई थी।

महंगी रात….

Credits – Meena Kumari

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